Teen maut || rahul raj renu ||तीन मौत || राहुल राज रेणु || part-1

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                                                                 -ःतीन मौतः-                                                                                                        -राहुल राज रेणु    रात का खाना खाने के बाद थोड़ी बहुत खाना बच जाती थी। उस खाने को सुलोचना बाहर बरामदा पर रख जाती थी।    “सुलोचना कटिहार के सबसे धनी लाला का दुलारी बेटी थी। सुलोचना के पिता जी इज्जतदार व्यक्ति थें।उनके घर में तीन ही आदमी का बसेरा रहता.....माँ-पिता जी और सुलोचना।सुलोचना का एक बड़ा भाई बैंगलोर में ईंजीनियर  की पढ़ाई कर रहा है।सुलोचना बी0एस0सी की छात्रा है...

phanishwar nath renu| shailendr| teesri kasam |bharat yayavar| rahul raj renu|page-5| फणीश्वर नाथ रेणु | शैलेन्द्र | तीसरी कसम अर्थात मारे गए शैलेन्द्र | भारत यायावर |राहुल राज रेणु |पेज -5

                                ||  तीसरी कसम अर्थात् मारे गए शैलेन्द्र ||          पेज -5

                                                                          ----भारत यायावर

 

           फिर शैलेन्द्र ने राज कपूर की ‘बरसात’ फिल्म के लिए उसका शीर्षक गीत लिखा — ‘‘बरसात में हमसे मिले तुम सजन, तुमसे मिले हम, बरसात में।’’ यह 1949 की सबसे ज्यादा व्यावसायिक लोकप्रियता ग्रहण करने वाली फिल्म थी एवं शैलेन्द्र का लिखा यह पहला फिल्मी गीत इतना लोकप्रिय हुआ कि शैलेन्द्र की मांग फिल्मी दुनिया में अचानक बढ़ गई। ‘आग’ फिल्म के बाद राज कपूर की फिल्मों में सिर्फ शैलेन्द्र एवं हसरत के ही गीत हुआ करते थे, उसमें भी ज्यादातर शैलेन्द्र के ही। फिर राज कपूर की ‘आवारा’ 1951 ई. में प्रदर्शित हुई. इसका शीर्षक गीत —

        ‘‘आवारा हूं या गर्दिश में हूं आसमान का तारा हूं’’ ने भी लोकप्रियता का  कीर्तिमान स्थापित किया। ‘श्री 420’ का शीर्षक-गीत — ‘‘मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंगलिस्तानी, सर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी’’ तो कालातीत हो गया। राज कपूर की जिन अन्य फिल्मों में शैलेन्द्र ने यादगार गीत लिखे — उनमें ‘जिस देश में गंगा बहती है’, ‘बूट पॉलिस’, ‘अनाड़ी’, ‘संगम’ आदि प्रमुख हैं। इनके कुछ प्रमुख गीत हैं —

नन्हे-मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है!
मुट्ठी में है तकदीर हमारी।

बूट पालिस (1954)

           यह गीत हमारे बच्चों को नई आस्था, विश्वास और श्रम के साथ आगे बढ़ने के लिए उत्प्रेरित करता है ।
यह बात शैलेन्द्र कितने ओजस्वी, प्रभावपूर्ण एवं मार्मिक ढंग से अपने गीतों में अपनेपन के साथ समय, समाज और देश को रख रहे थे। ‘श्री 420’ का गीत ‘दिल का हाल सुने दिलवाला’ फिल्मी गीतों में एक नई शैली की गीति-रचना है। इसमें शैलेन्द्र ने भारत की भूखी-नंगी, दुखी-विपन्न जनता को अपनी वाणी दी है —

छोटे से घर में, ग़रीब का बेटा
मैं भी हूँ माँ के नसीब का बेटा
रंजों-गम बचपन के साथी
आँसुओं से जली जीवन-बाती
भूख ने है बड़े प्यार से पाला
दिल का हाल सुने दिलवाला !

गम से अभी आज़ाद नहीं हूँ
ख़ुश हूँ, मगर आबाद नहीं हूँ
मंज़िल मेरे पास खड़ी है
पाँव में मेरी बेड़ी पड़ी है
टाँग अड़ाता है दौलतवाला
दिल का हाल सुने दिलवाला !

        ‘जागते रहो’ फिल्म में मोतीलाल पर चित्रित किया गया और मुकेश के द्वारा गाया गया यह गीत एक नया जीवन-दर्शन प्रस्तुत करता है —

 

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